Monday, September 5, 2016

माँ कह एक कहानी


"माँ कह एक कहानी।"
बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?"
"कहती है मुझसे यह चेटीतू मेरी नानी की बेटी
कह माँ कह लेटी ही लेटीराजा था या रानी?
माँ कह एक कहानी।"

"तू है हठीमानधन मेरेसुन उपवन में बड़े सवेरे,
तात भ्रमण करते थे तेरेजहाँ सुरभी मनमानी।"
"जहाँ सुरभी मनमानी! हाँ माँ यही कहानी।"

वर्ण वर्ण के फूल खिले थेझलमल कर हिमबिंदु झिले थे,
हलके झोंके हिले मिले थेलहराता था पानी।"
"लहराता था पानीहाँ हाँ यही कहानी।"

"गाते थे खग कल कल स्वर सेसहसा एक हँस ऊपर से,
गिरा बिद्ध होकर खर शर सेहुई पक्षी की हानी।"
"हुई पक्षी की हानीकरुणा भरी कहानी!"

चौंक उन्होंने उसे उठायानया जन्म सा उसने पाया,
इतने में आखेटक आयालक्ष सिद्धि का मानी।"
"लक्ष सिद्धि का मानी! कोमल कठिन कहानी।"

"माँगा उसने आहत पक्षीतेरे तात किन्तु थे रक्षी,
तब उसने जो था खगभक्षीहठ करने की ठानी।"
"हठ करने की ठानी! अब बढ़ चली कहानी।"

हुआ विवाद सदय निर्दय मेंउभय आग्रही थे स्वविषय में,
गयी बात तब न्यायालय मेंसुनी सब ने जानी।"
"सुनी सब ने जानी! व्यापक हुई कहानी।"

राहुल तू निर्णय कर इसकान्याय पक्ष लेता है किसका?"
"माँ मेरी क्या बानीमैं सुन रहा कहानी।
कोई निरपराध को मारे तो क्यों उसे उबारे?
रक्षक पर भक्षक को वारेन्याय दया का दानी।"

"न्याय दया का दानी! तूने गुणी कहानी।"

Daughter – Main Aayi To Kyon




आज जब मैं जहां में आयी तो क्यों इंतेजार था किसी और का।
क्यों आते ही सताने लगा एक डर का एहसास तुम्हें माँ।
नारी के जन्म का अभिमान करो।
धरा की तरह सहती है कष्टों की बुनियाद।
फिर भी बस खुशियाँ ही तो लुटाती है नारी।
तो किस बात का अफ़सोस माँ।
एक दिन होके बड़ी पापा तुम्हारा सहारा बनूंगी।
बेटों से भी बढ़के मझदार में किनारा बनूँगी।
तो क्यों उदास हो पापा।
कितनी छोटी हूँ हाथों में तो उठाओ।
गले से लगाके मुस्कुराओ माँ।
क्यों नारी ही अस्तित्व तलाशती है माँ।
क्या बेजान जिस्म है मेरा या सम्बेदना से दूर हूँ मैं।
जो हर बार गाल पे तमाचा सहती हूँ माँ।
क्यों पिता का कन्धा झुका सा रहता है।
क्यों नहीँ मुझपे भी फक्र होता है।
क्या कुछ अर्थ नहीँ मेरे जीवन का।
अनपूर्णा कहते हैं पर भूख मेरी ही अधूरी रह जाती है।
रातों को क्यों नहीँ कोई माथा सहलाता है मेरा।क्यों खफा होने पर मुझे कोई मनाता नहीँ।
फूल चढ़ाते हैं देवी पर।पर घर की देवी क्यों हर वक़्त तिरस्कृत रहती है माँ।
क्या आज मेरा ये मांगना गलत है की आज जब मैं जहां में आयी तो क्यों इंतेजार था

किसी और का।क्या कभी मेरे आने पर भी खुशियाँ मनायी जाएँगी?