Monday, September 5, 2016

Daughter – Main Aayi To Kyon




आज जब मैं जहां में आयी तो क्यों इंतेजार था किसी और का।
क्यों आते ही सताने लगा एक डर का एहसास तुम्हें माँ।
नारी के जन्म का अभिमान करो।
धरा की तरह सहती है कष्टों की बुनियाद।
फिर भी बस खुशियाँ ही तो लुटाती है नारी।
तो किस बात का अफ़सोस माँ।
एक दिन होके बड़ी पापा तुम्हारा सहारा बनूंगी।
बेटों से भी बढ़के मझदार में किनारा बनूँगी।
तो क्यों उदास हो पापा।
कितनी छोटी हूँ हाथों में तो उठाओ।
गले से लगाके मुस्कुराओ माँ।
क्यों नारी ही अस्तित्व तलाशती है माँ।
क्या बेजान जिस्म है मेरा या सम्बेदना से दूर हूँ मैं।
जो हर बार गाल पे तमाचा सहती हूँ माँ।
क्यों पिता का कन्धा झुका सा रहता है।
क्यों नहीँ मुझपे भी फक्र होता है।
क्या कुछ अर्थ नहीँ मेरे जीवन का।
अनपूर्णा कहते हैं पर भूख मेरी ही अधूरी रह जाती है।
रातों को क्यों नहीँ कोई माथा सहलाता है मेरा।क्यों खफा होने पर मुझे कोई मनाता नहीँ।
फूल चढ़ाते हैं देवी पर।पर घर की देवी क्यों हर वक़्त तिरस्कृत रहती है माँ।
क्या आज मेरा ये मांगना गलत है की आज जब मैं जहां में आयी तो क्यों इंतेजार था

किसी और का।क्या कभी मेरे आने पर भी खुशियाँ मनायी जाएँगी?

No comments:

Post a Comment